Tuesday, 19 November 2019

करनाल हरियाणा के इस चौधरी ने लगातार दो बार अंग्रेजों को धूल चटाई थी

अमर बलिदानी चौधरी राम सिंह मान (1857 करनाल हरियाणा)


Martyr of 1857
चौधरी राम सिंह मान

चौधरी राम सिंह जी मान करनाल के बल्ला गांव के चौधरी थे।वे एक महान देशभक्त और यौद्धा थे। वे घुड़सवारी और तलवार चलाने मे बिल्कुल निपुण थे।

1857 की क्रांति के दौरान अपने गांव व आस पास के क्षेत्र से लगभग 900 जाट वीरों की एक सेना तैयार की। जिनका उद्देश्य गांव की सुरक्षा करना व अंग्रेजो का विनाश करना था। स्वयं एक 50 वीरों घुड़सवार का जत्था बनाकर एक जगह से मोर्चा सम्भाला।

अंग्रेजी मेजर हुंगस के नेतृत्व में 1st पंजाब घुड़सवार फौज गांव की तरफ आगे बढ़ी। इन्होंने क्रांतिकारियों की गतिविधियों से घबराकर गांव पर हमला कर दिया।

इस युद्ध में वीर क्रांतिकारियों ने बन्दूको से गोलियों की बौछार करी ।पास आते ही राम सिंह की घुड़सवार फौज ने अंग्रेज़ी फौज पर हमला किया और काफी सैनिकों को काट डाला। यहा से हारने के बाद अगले दिन अंग्रेजी फौज फिर से और संख्या मे आयी लेकीन भारत माता के इस वीर योद्धा की बहादुरी के कारण अंग्रेजी फौज को फिर भागना पड़ा । निरंतर दो बार हारने के कारण अब अंग्रेजो ने बड़ी तोपे और ज्यादा सैनिक भेजे ।तोपो की मार से कई बन्दूकची शहीद हो गये ।

अब वीर क्रान्तिकारियों ने अपनी आखिरी लडाई लड़ने हेतु पगड़ी बान्धकर ,तलवार लेकर जंग में कूद पड़े । राम सिंह के नेतृत्व में मात्र 50 घुड़सवारों के सामने तोपो के गोले और उनसे बड़ी अंग्रेजी फौज जिनके पास आधुनिक हथियार थे के बीच एक भीषण युध्द हुआ जिसमे राम सिंह और उनके सब के सब साथी शहीद हो गए लेकीन उन्होंने एक कदम भी पीछे नही हटाया।

लेकिन कितने शर्म की बात है कि अब तक इस महान क्रांतिकारी व अन्य शहीदों के लिए कोई मूर्ति या स्मारक नहीं बनवाया गया।

जय हिंद। जय भारत माता।

Monday, 18 November 2019

इस संत ने अंग्रेजों से लड़कर किया था रानी लक्ष्मीबाई का अंतिम संस्कार। जानिए इनके बारे में...

हम सब जानते हैं कि 1857 की क्रांति में झांसी की रानी लक्ष्मीबाई ने अंग्रेजों से लड़ाई लड़ी थी और वीरगति को प्राप्त हुई। अंतिम क्षण में वे घायल थी तो अंग्रेज उनके पीछे पड़े हुए थे तब वे एक सन्त के आश्रम में गयी थी वहां उस सन्त जे उनकी रक्षा की व अपनी कुटी जलाकर उनका अंतिम संस्कार किया। और इस दौरान लगभग 700 से ऊपर साधुओं ने अंग्रेजो से लड़ते नए शहादत दी थी।
वह सन्त कोई और नहीं बल्कि सन्त गंगादास आश्रमशाला के सन्त गंगादास जी मुंडेर थे।
जानिए उनके बारे में
Gangadas Munder
संत गंगादास जी

महात्मा गंगादास जी का जन्म 14 फरवरी 1823 को बसंत पंचमी के दिन उत्तर प्रदेश के हापुड़ जिले के रसूलपुर बहलोलपुर गांव में एक धनी जाट परिवार में हुआ था। उनके पिता चौधरी सुखीराम जी मुंढेर के पास 600 एकड़ जमीन थी व उनके परिवार का वातावरण बहुत धार्मिक था। उनकी माता दखाकौर हरियाणा के बल्लभगढ के एक गांव से थी।

महात्मा जी का बचपन का नाम गंगाबक्ष जी था।
गंगाबक्ष जी बचपन से ही बहुत धार्मिक व साफ सफाई रखते थे उन्हें थोड़ी सी मिट्टी लगते ही वे रोने लग जाते थे व बहुत पूजा पाठ और भक्ति भी करते थे।इसलिए लोग उन्हें व्यंग से भगत जी ही कहते थे। लेकिन ये कौन जानता था कि यही भगत एक दिन इतना बड़ा महात्मा बन जायेगा।
छोटी सी उम्र में ही गंगादास जी के माता पिता चल बसे थे। इसलिए वे 12 वर्ष की उम्र में ही एक अच्छे गुरु की खोज में निकल पड़े। गंगादास जी की विरक्ति एवं बुद्धिमता देखकर सेदेपुर जिला बुलंदशहर की कुटी के संत बाबा विष्णुदास उदासीन ने इन्हें अपना शिष्य बना लिया था।

1857 की क्रांति के अग्रदूत
Rani Laxmi bai Guru
महंत गंगादास जी

सन्त जी अपनी मातृभूमि से बहुत प्रेम करते थे व इसे अंग्रेजो की दासता से मुक्त करवाना चाहते थे।
इस समय वे अपने आश्रम गंगादास की शाला ग्वालियर में रहते थे।
1857 की क्रांति में गंगादास जी सक्रिय रहे और अपने घोड़े पर चढ़कर जगह जगह घूमकर लोगो को स्वतन्त्रता संग्राम में शामिल होने के लिए उत्साहित किया।
बहुत से क्रांतिकारी उनसे गुप्त रूप से मिलने आते थे।
गंगादास जी उन्हें मार्दर्शन करते थे। वे अपने उपदेशों से क्रांतिकारियों में एकता लाते एवं उनकी सहायता के लिए हमेशा तैयार रहते थे।
1857 की क्रांति के समय उनके आश्रम में राजाओ की एक मीटिंग भी हुई थी।जहां उन्होंने उपदेश दिया व रणनीति निर्माण में उनका मार्गदर्शन किया।

रानी लक्ष्मीबाई जी के सद्गगुरु-


महात्मा गंगादास जी महारानी लक्ष्मीबाई जी के पिता के गुरु थे। लक्ष्मीबाई जी को भी बचपन मे उन्होंने दीक्षा दी थी।
शादी के बाद भी जब भी रानी लक्ष्मीबाई व्यथित होती थी तो वे अपने पारिवारिक गुरु गंगादास जी से अपनी सहेली मुंढेर के साथ उनसे मार्गदर्शन के लिए मिलने आती थी।

एक बार लक्ष्मीबाई ने उनसे पूछा के स्वराज किस प्रकार मिलेगा? गुरुजी ने कहा कि स्वराज बलिदानों से मिलेगा। जब हम सब भेदभाव भूलकर एक हो जाएंगे और स्वराज रूपी भवन के लिए बलिदान रूपी पत्थरो को लगेट जाएंगे तो एक दिन स्वराज जरूर मिलेगा।

फिर एक दिन जब लक्ष्मीबाई को लगा कि वे स्वराज अपने जीवन मे नहीं देख पाएगी तो उन्होंने अपनी यह व्यथा गुरुजी से बताई। तो गुरुजी ने उन्हें समझाया कि जैसे कोई भवन बनाने से पहले नींव रूपी गड्ढे को पत्थरो से भरना जरूरी होता है वैसे ही स्वराज रूपी भवन को बनाने के लिए बलिदान रूपी पत्थरो से पहले नींव भरनी जरूरी है। आज के बलिदानी भले ही अचानक से स्वराज न ला सकते परन्तु वे नींव का काम कर रहें हैं। आगे चलकर इसी नींव पर कंगूरा खड़ा होगा। और नींव के बिना कंगूरे का कोई अर्थ नहीं ईसलिये ये बलिदान व्यर्थ नहीं बल्कि हमारे स्वराज का आधार होंगे।

महात्मा जी ने रानी लक्ष्मीबाई का हमेशा साथ दिया।

रानी लक्ष्मीबाई का अंतिम संस्कार-
साधुओ की वीरगाथा
रानी लक्ष्मीबाई


जब वीरांगना लक्ष्मीबाई युद्ध मे घायल हो गयी और मरणासन्न अवस्था में थी तो उन्होंने अपने साथियों से कहा कि ऊनका शव दुष्ट अंग्रेजो के हाथ नहीं लागना चाहिए। सलिये उनके साथी उन्हें अंग्रेजो से बचकर बाबा गंगादास जी की शाला में ले गए।
महात्मा गंगादास जी ने पहुंचते ही लक्ष्मीबाई के हालात देखे और लक्ष्मीबाई ने उन्हें हर हर महादेव कहकर प्रणाम किया। महात्मा ने कहा कि हमें सीता और सावित्री के देश की इन महान वीरांगनाओं पर हमेशा गर्व रहेगा।

कुछ क्षण बाद वीरांगना ने अपने प्राण त्याग दिए। उसके बाद सब दुखी हो गए सबकी आंखे आंसुओ से भर गई। तब महात्मा जी ने सबको समझाया कि प्रकाश का कभी अंत नहीं होता यह हमेशा जगत को प्रकाशमान करता है। यह पुनः प्रज्वलित होकर चमकेगा। लक्ष्मी मरी नहीं बल्कि अमर हो गयी है। इसलिए अपना मोह त्यागकर जल्दी से अंतिम संस्कार की तैयारी शुरू करो अंग्रेज जल्द ही यहां पहुंचने वाले हैं।
इसके बाद साधुओं व रानी के संगियो ने तैयारियां शुरू कर दी। बरसात का मौसम था सुखी लकड़ी मिलना असम्भव था इसलिए आश्रम में पड़े घसे को इक्कठा किया जाने लगा तो महात्मा जी ने उन्हें रोका और कहा के उनकी कुटिया उधेड़ लो। यह सुनकर सब आश्चर्यचकित रह गए उन्होंने कहा कि इससे आपका नुकसान होगा। तो उन्होंने कहा रानी के बलिदान के आगे इस कुटिया की कीमत कुछ नहीं। ये दान से बनी है और दान आएगा तो फिर बन जाएगी।
फिर कुटिया की लकड़ियों से रानी का अंतिम संस्कार किया गया।

इसी बीच अंग्रेजो ने हमला कर दिया। गंगादास जी की शाला के 745 साधुओं ने उनसे लोहा लिया व अपना सर्वस्व बलिदान कर दिया। रानी के सहयोगियों को पीछे से निकाल दिया गया अंग्रेजो को कुछ नहीं मिला।

बाद में अंग्रेजी सरकार के दबाव से ग्वालियर के सिंधिया राजा ने उन्हें देश निकाला दे दिया। और आश्रम जी जागीर हड़प ली। कहते हैं कि महात्मा जी को रानी ने अपने गुप्त खजाने का राज बता दिया था ताकि वह अंग्रेजो के हाथ न लगे।महात्मा जी व उनके शिष्य कालूराम ने उसे तीन हिस्सों में करके अलग अलग जगह छुपॉ दिया। आज भी वह खजाना वहीं छुपा हुआ है क्योंकि वह खजाना कभी नहीं निकाला गया और महात्मा व उनके शिष्य की मृत्यु के साथ ही वह राज राज ही रह गया।
देश निकाले के पश्चात महात्मा जी रानी की अस्थियों को लेकर हरिद्वार चले गए और उन्हें गंगा में प्रवाहित कर उनकी आत्मा की शांति के लिए प्रार्थना की।
फिर वे बनारस चले गए। बाद में सिंधिया को जनसमर्थन के आगे आत्मग्लानि महसूस हुई और उन्हें झुकना पड़ा। जागीर वापिस आश्रम को दे दी गयी व महात्मा का प्रतिबंध हटा दिया गया।
महात्मा जी जीवन पर्यंत भक्ति, क्रांति व समाज सुधार में लगे रहे।

हिंदी साहित्य के भीष्म पितामह-
हिंदी साहित्य के भीष्म पितामह
खड़ी बोली के आदिकवि

आज जो हिंदी हम बोलते हैं वह खड़ी बोली का ही मानक रूप है। यह वो दौर था जब खड़ी बोली को कोई काव्य व साहित्य के लिए उपयुक्त नहीं समझता था तब महात्मा जी ने खड़ी बोली में काव्य साहित्य की रचना की व उसका विकास करके प्रचलन किया।


उनके शिष्य जैसे-चेतराम, बालूराम, दयाराम, मोतीराम, मोहनलाल आदि  उनकी पद काव्य रचनाएं घूम घूमकर लोगो को सुनाते थे जिससे जागरूकता के साथ साथ हिंदी का भी विकास हो रहा था।

इस तरह उन्हें खड़ी बोली का आदिकवि कहा जाता है। और हिंदी साहित्य में उनके योगदान के कारण उन्हें हिंदी साहित्य का भीष्म पितामह कहा जाता है। उनके बाद भारतेंदु हरिश्चंद्र जैसे कावियो ने हिंदी के विकास में योगदान दिया और जो हिंदी आज हम बोलते हैं वो इन्हीं विद्वानों की देन हैं।

उन्होंने अपने 90 वर्ष के जीवन काल मे 50 से अधिक गर्न्थो की रचना की। महाकवि संत गंगा दास ने 25 कथा काव्यों और कई सहस्र निर्गुण पदों कुंडलियों की रचना की थी, जो हिंदी साहित्य के लिए अमूल्य निधि हैं. उनके प्रमुख कथा काव्य निम्न लिखित है - पार्वती मंगल (दो भाग), नल दमयंती, नरसी भक्त, ध्रुव भक्त, कृष्णजन्म, नल पुराण, राम कथा, नाग लीला, सुदामा चरित, महा भारत पदावली, बलि, बलि के पद रुक्मणी मंगल, प्रह्लाद भक्त, चन्द्रावती-नासिकेत, भ्रमर गीत मंजरी, हरिचंद होली, हरिचंद के पद, गिरिराज पूजा, होली पूरनमल, पूरनमल के पद, द्रोपदी-चीर आदि प्रमुख हैं।
कबीर का फक्कड़पन, सूर की भक्ति, तुलसी का समन्वय, केशव की छंद योजना और बिहारी की कला एक ही स्थान पर देखनी हो तो संत गंगा दास का काव्य इसका सटीक उदहारण है।

उनका बहुत सा साहित्य व रचनाएं अभी लोगो के सामने नहीं आयी है उन पर खोने का कार्य अभी जारी है।
महा कवि गंगादास जैसी अमूल्य मणि पर पड़ी समय की धूल को साफ़ करने का पुण्य कार्य दिल्ली के डॉ जगन्नाथ शर्मा 'हंस' कर रहे हैं। सर्वप्रथम उन्होंने १९७० में 'महाकवि गंगादास व्यक्तित्व और क्र्तित्व' विषय पर शोध ग्रन्थ लिखा। वे पिछले कई वर्षों से 'अखिल भारतीय गंगादास हिंदी संसथान' के माध्यम से गंगादास जी पर शोध, साहित्य प्रकाशन एवं जन जाग्रति का कार्य करवा रहे हैं।

चमत्कारी सन्त- 

सन्त गंगादास जी चमत्कारिक व्यक्तित्व कर धनी थे।
संत गंगा दास जी ग्राम ललाने में सेठ हरलाल की हवेली में कुछ दिन रुके थे। उन्ही दिनों सेठ के घर कुख्यात दस्यु झंडा गुजर ने डाका डाला था। संत गंगा दास के हस्तक्षेप करने पर झंडा गुजर ने लालाजी के आभूषण लोटा दिए तथा संत जी के पैर छूकर माफ़ी मांगी थी। सेठ काशी राम के कोई संतान न थी संत गंगा दास की सेवा से संतान प्राप्ति की बात भी काफी प्रचलित है।

संत गंगा दास जी ने काशी में २० वर्षों तक रहकर वेदांत, व्याकरण, गीता, महाभारत, रामायण, रामचरित मानस, अद्वैत कौस्तुम तथा मुक्तावली आदि दार्शनिक ग्रंथों का गहन अध्ययन किया। संत जी ने जिला मुरादाबाद उत्तर प्रदेश, हरियाणा, पंजाब, दिल्ली, और राजस्थान में भी भ्रमण किया था।

बक्सर के निकट फतापुर ग्राम में ये १९ वर्षों तक रहे और चौधरी रकम सिंह और पंडित चिरंजीव लाल को क्रमश: हिन्दी और संस्कृत व्याकरण पढ़ाई थी। यहाँ इनके अनेक शिष्य रहते थे जिनमें जियाकौर नामक शिष्या को भी यहीं दीक्षित किया गया था।

संध्या के समय संत जी गाँव से बाहर बाग़ के कुंए पर बैठकर बंशी बजाया करते थे। कहते हैं ये बंशी इतनी मधुर बजाते थे कि वहां विशाल जनसमूह और सैंकडों मयूर भी इकट्ठे हो जाते थे।

काशी से लौटने के पश्चात् ये अपने ग्राम में काफी दिन तक रहे। यहाँ ये साधू वेश में अलग कुटिया बनाकर रहते थे।
सन १९१७ में ये अपने घोडे पर चढ़कर आसपास के संतों से मिलते थे। दिल्ली दरबार को देखने जब संत जी अपने घोडे पर चढ़कर दिल्ली पहुंचे तो प्रबंधकों ने इस भव्य वक्तित्व से प्रभावित होकर इनको किसी रियासत का राजा समझ कर आगे की कुर्शियों पर बिठाने लगे। परन्तु महात्मा जी ने अवगत कराया कि वे तो एक साधू हैं। अपने जीवन के अन्तिम २५-२६ वर्षों तक ये गढ़मुक्तेश्वर में रहे। ये समाधी लगाते थे। एक बार अपने शिष्य दयाराम से कोटड़ी का ताला लगवाया तथा एक मास बाद बाहर आए। इस घटना से इनकी ख्याति बहत फ़ैल गई। इनका कद लंबा और हष्ट-पुष्ट था. इनका चेहरा लालिमा से दहकता था। भक्त जी आजीवन ब्रह्मचारी रहे।

ब्रह्मलीन/प्राणत्याग/निर्वाण

संत गंगा दास ने सन 1913 में भाद्रपद कृष्ण अष्टमी को प्रात अपना पार्थिव शरीर त्याग दिया था। जन्माष्टमी के दिन प्राण त्यागने से पहले इन्होने कुटुम्बियों को आदेश दिया कि मेरा शव गंगा में प्रवाहित कर देना, मेरे इस स्थान की कोई भी वस्तु घर मत ले जाना क्योंकि यह सब दान माल की है। लेटे हुए ही उन्होंने यह आदेश दिया था। फ़िर वहां से सबको बाहर जाने के लिए कहा। सबके बाहर जाने के बाद वे शीघ्रता से उठकर बैठ गए। पदमासन लगाया और ब्रह्मलीन हो गए। अब वह स्थान जहाँ महात्मा जी का आश्रम था उदासी साधू बुद्धा सिंह द्वारा डॉ राम मनोहर लोहिया कालिज को दान में दे दिया गया है।
उनकी समाधी रसूलपुर गाँव के निकट गढ़मुक्तेश्वर मार्ग पर चोपला में बनी है।
खड़ी बोली के आदिकवि
हिंदी साहित्य के भीष्म पितामह

महात्मा गंगादास जी खड़ी बोली के आदिकवि हिंदी साहित्य के भीष्म पितामह, उच्च कोटि के सन्त व समाज सुधारक और महान स्वतंत्रता सिनाई व देशभक्त थे।

इन महान विभूतियों का कर्ज हम कभी नहीं चुका सकते।
आने वाली पीढ़ी को इनके बारे में ज्ञान हो इसके लिए हमें सदा प्रयत्नरत रहना चाहिए।

जय सन्त गंगादास जी, जय राष्ट्रभाषा हिन्दी, जय भारत माता।

IAS बनने का सपना त्यागकर अयोध्या में श्रीराम मंदिर निर्माण हेतू रण में कूद पड़ी थी यह वकील

राम मंदिर पर शोध करने वाली एवं फैसले की इलेक्ट्रॉनिक रिपोर्ट तैयार करने वाली वकील शिवानी तुषिर महान धर्म वीरांगना शिवानी तुषिर
Advocate Ram Mandir
वीरांगना वकील शिवानी तुषिर 

IAS बनने का सपना त्यागकर रामलला के मंदिर के लिए रण में कूद पड़ी थी शिवानी

अभी हाल ही में आये अयोध्या के श्री राम मंदिर निर्माण के फैसले पर आज पूरा देश खुशी से झूम रहा है। इस फैसले के आने के पीछे बहुत से लोगों की मेहनत रही है। उन्हीं में से एक प्रमुख नाम है अधिवक्ता शिवानी तुषिर।
शिवानी तुषिर एक युवा महिला वकील है जिसने अपनी यूपीएससी की तैयारी व सपना त्यागकर श्री राम मंदिर के केस पर शोध किया। उन्होंने व उनकी टीम ने लाखों रुपये  की किताबे खरीदी, दिन रात बारीकी से अध्ययन किया और कोर्ट को एक नतीजे पर पहुंचाया। उन्होंने हिन्दू धर्म ग्रन्थों के अलावा बाबरनामा, आईने अकबर, कुरान जैसी किताबो का भी गहनता से अध्ययन करके सबूत जुटाए। पुराने केसों का भी उन्होंने बारीकी से अध्ययन किया और वकालत के क्षेत्र में एक अनूठा उदाहरण पेश कर दिया।

इतना ही नहीं शिवानी तुषिर ने 8000 पन्नो के फैसले की इलेक्टोनिक रिपोर्ट भी गहन अध्ययन व मेहनत से तैयार की। जिसके फलस्वरूप आज मन्दिर निर्माण का फैसला हमारे सामने हैं।

शिवानी का लक्ष्य आईएएस बनना था इसके लिए वह यूपीएससी की तैयारी करना चाहती थी लेकिन इस केस से जुड़ने के बाद उन्होंने अपनी तैयारी त्याग दी व पूरा समय व ध्यान और मेहनत राम लल्ला के मंदिर हेतु लगा दी। पिछले 2 साल से वे इस कार्य में जुटी हुई थी।उन्हें काफी परेशानियां आई लेकिन 92 साल के वकील पराशन को लगे देखकर उनका हौसला बढ़ जाता था।

फैसला आने पर शिवानी ने कहा कि उनका मकसद पूरा हो गया और ऐसा लग रहा है जैसे उन्होंने अपना सपना और अपना लक्ष्य पूरा कर लिया हो।

शिवानी हरियाणा के सोनीपत जिले के गढ़ी ब्रह्मनान गांव  की निवासी है।शिवानी ने अपने कैरियर की महान उपलब्धि हासिल करके पुरे देश में रामभक्त व एक अच्छे वकील के रुप में अनूठी पहचान बना ली है।

जय जय श्री राम।जय भारत माता।

14 और 16 साल की इन दो बालिकाओं ने 1857 की क्रांति में अंग्रेजों के छक्के छुड़ा दिए थे

1857 में बड़ौत की दो महान बाल वीरांगनाओं के बलिदान की गाथा

Jat Warriors Children
जयदेवी और शिवदेवी तोमर

बाबा शाहमल तोमर जाट जी के बलिदान के बाद अंग्रेजों ने बड़ौत व बागपत के गांवों पर हमला कर दिया था उस समय इस अत्याचार को देखकर 16 साल की बाल वीरांगना शिवदेवी तोमर ने अपने मित्रो के साथ मिलकर अंग्रेजो के खिलाफ लड़ाई की शुरुआत कर दी थी। शिवदेवी ने बड़ौत में अंग्रेजो के तंबुओं पर हमला करके 17 अंग्रेजों को मौत के घाट उतार दिया था।25 भागकर छुप गए थे। वीरांगना घायल हो गयी तो फिर अंग्रेजो ने उन्हें घर लिया व उन पर हमला कर दिया जिसमें वे वीरगति को प्राप्त हुई।

इसके बाद शिवदेवी की 14 वर्षीय छोटी बहन जय देवी ने यह दृश्य अपने तिमंज़िले मकान से देखा। उसने बड़ौत वासियों को कहा कि मेरे बहन के प्रति सच्ची श्रद्धाजलि यह है कि हम आजादी के लिए बड़ी से बड़ी कुर्बानी देते रहें। जयदेवी ने प्रण किया कि जिस अंग्रेज़ ने उसकी बहन तथा वीरों पर गोलियां चलाने का आदेश दिया था उसका बदला अवश्य लूँगी। उसने गंगोल गाँव में अंग्रेजों द्वारा फांसी पर लटकाए, लिसाड़ी गाँव के 22 क्रांतिकारियों के छलनी किए शरीरों का तथा घोलाना के 14 वीरों के पेड़ों पर लटकाए हुये शवों को भी देखा, फिर भी वह डरी नहीं। वीर बालिका जयदेवी अंग्रेजों के रिसाले का पीछा करती रहती तथा गावों में घूम-घूम कर युवक-युवतियों में जोश पैदा करती। जयदेवी के साथ लगभग 200 क्रांतिकारियों का जत्था चलता था । इसने अग्रेज़ रिसाले का लखनऊ तक पीछा किया लेकिन अंग्रेजों को जयदेवी की खबर तक नहीं लगी। इस वीर बालिका ने मेरठ, बुलंदशहर, अलीगढ़, एटा, मैनपुरी, इटावा आदि जिलों में भी क्रांति की अलख जगाई।

लखनऊ में जयदेवी ने अपने क्रांतिकारी दस्ते द्वारा बड़ौत में अत्याचार करने वाले अंग्रेज़ अधिकारी के बंगले की खोज करवाली। कई दिनों तक अंग्रेज़ अधिकारी को मारने का प्रयास होता रहा। लखनऊ में उन्हें छिपकर रहने और खाने की भारी परेशानी हुई, लेकिन एक दिन बंगले में टहलते हुये अंग्रेज़ अफसर का सिर जयदेवी ने तलवार से उड़ा दिया। उसके अनुयायियों ने अंग्रेज़ सैनिकों को मार गिराया और बंगले को आग लगा दी । क्रांतिकारी अंग्रेजों से झुंझकर जुझार हो गए। कपड़ों पर लगे खून से अंग्रेज़ जयदेवी को पहचान कर पाये और उसकी देह को लखनऊ में पेड़ से लटका दिया गया। अंग्रेजों के भयंकर आतंक के बावजूद क्रांतिकारियों ने उनके पार्थिव शव का अंतिम संस्कार करके उस पर चबूतरा बनवा दिया। यह चबूतरा विधानसभा की दूरदर्शन वाली सड़क पर है।
जाट वीरांगना बहने 1857
शहीद बालिका जयदेवी तोमर समाधि


 यहाँ देशभक्त आज भी सिर झुका कर श्रद्धा-सुमन अर्पित करते हैं। बूढ़े लोग आज भी जयदेवी की लोक-कथा सुनाकर बलिकाओं में वीरता का संचार करते हैं।

लेकिन कितने शर्म की बात है कि आज हम अपने बच्चों को देशभक्ति एवं वीरता की मिसाल इस सत्य कहानी को बताने की बजाय उन्हें झूठे व संस्कृति विरुद्ध कार्टून दिखा रहे हैं।

जय हिंद। जय भारत।